Sunday, April 3, 2011

दूर-दराज संगीत की अलख


इस समय कला-संस्कृति के आयोजनों का सबसे बड़ा केन्द्र राजधानी होने की वजह से दिल्ली है। पर सरकारी स्तर और व्यावसायिक कंपनियों द्वारा महंगे सभागारों में आयोजित होने वाले ये कार्यक्रम अक्सर मंडी हाउस के आसपास सीरीफोर्ट, हैबिटेट सेंटर और इंडिया इन्टरनेशनल सेंटर में ही होते हैं। इनमें ज्यादातर अभिजात्य वर्ग के वे लोग शामिल होते हैं जिनके लिए संगीत सुनना वैसे ही है जैसे फिल्म देखना, क्लबों या पांच सितारा होटलों आदि में जाना। इन आयोजनों में कलारसिकों की संख्या नगण्य ही होती है। इसके बावजूद दिल्ली के दूरदराज के इलाकों में संगीत के लिए समर्पित कुछ लोग निजी स्तर पर संगीत के प्रचार-प्रसार में लगे हैं। ऐसी ही एक संस्था है नजफगढ़ की तान तरंग संगीत सभा। इस संस्था के संस्थापक और संगीत मर्मज्ञ सुरेश गंधर्व के प्रयासों से नजफगढ़ में संगीत की अलख जगी है। क्षेत्र के काफी लोगों की रुचि शास्त्रीय संगीत में दिखाई पड़ रही है। संगीत के शिखर पुरुष उस्ताद अमीर खां की स्मृति में स्थापित यह संगीत सभा साल में कई आयोजन करती है। जिसमें दिल्ली और बाहर के कलाकार शामिल होते हैं। संगीत के कार्यक्रम के अलावा यह संस्था संगीत के विद्वान लेखक और कलाकारों को हर साल तान तरंग संगीत सम्मान से पुरस्कृत भी करती है। हाल में नजफगढ़ में इस संस्था द्वारा संगीत की अनौपचारिक महफिल सजी। इसमें नौसर्गिक प्रतिभा का धनी 12 वर्षीय विशेष कंसल का हरमोनियम वादन, सुरेश गंधर्व का गायन और ग्वालियर के तबला वादक रामस्वरूप रतौरिया का एकल वादन शामिल था। नन्हें विशेष कंसल ने हरमोनियम के एकल वादन में राग बागेश्री और भूपाली को जिस परिपक्वता और शुद्धता से पेश किया उसे देख लोग चकित थे। रागदारी में पकड़ के अलावा कई चलन में वह राग को जैसे बरत रहा था उसे देख भविष्य में उसके उम्दा कलाकार बनने की उम्मीद जगी। उस्ताद अमीर खां की विलक्षण और अनूठी गायन शैली से जुड़े सुरेश गंधर्व की प्रतिभा राग परदीप की प्रस्तुति में दिखी। विलंबित में काफी थाट के इस राग के वैचित्र्य रूप को दर्शाने में स्वरों का लगाव और उनका विस्तार करते हुए पंचम और षडज में वे अच्छी न्यास दिखा रहे थे। सुनने में भीमपलास जैसे इस राग की शक्ल दिखाने में कोमल निषाद का सही स्पर्श था। गाने में गमक, मींड के स्वर तानों की निकास सरगम और लय के साथ तीनों सप्तकों में वे स्वरों का सुन्दर विचरण कर रहे थे। छोटा ख्याल की बंदिश को भी उन्होंने मधुरता से पेश किया। गायन में उनके साथ तबला पर संगत में सुभाष निर्वाण ने अपनी थिरकती उंगलियों का कमाल दिखाया। आखिर में रामस्वरूप रतौरिया के तबला वादन ने श्रोताओं को वशीभूत कर लिया। ग्वालियर घराने की परंपरागत शैली में उन्होंने तबला पर तीनताल के कायदे, पेशकार बोलों के टुकड़े, गतें और कई प्रकार की लय के आधार पर जो चलन दिखाये वे बेजोड़ थे। उन्होंने वादन में कुछ ऐसे गूढ़ चीजें पेश की, जो अब सुनने को ही नहीं मिलतीं। उत्तर भारत के कथक की लोकप्रियता अब दक्षिण में भी बढ़ती नजर आ रही है। खासकर कर्नाटक में इस नृत्य के प्रति काफी रुझान बढ़ा है। लखनऊ घराने की श्रेष्ठ नृत्यांगना और गुरु मायाराव ने बेंगलूरू में इस नृत्य के प्रचार और सिखाने में कीर्तिमान स्थापित किया है। इस समय कथम में कुशल जोड़ी नंदनी मेहता और के. मुरलीमोहन की है। उन्होंने अपने आकषर्क नृत्य की छाप न सिर्फ कर्नाटक बल्कि उत्तर भारत में भी छोड़ी है। नंदनी मेहता कथक और भरतनाट्यम दोनों में पारंगत हैं। के. मुरली को देख लगता है कि उन्होंने इस नृत्य की बारीकियों को गहराई से सीखने के साथ अभिनय पक्ष की भावाभिव्यक्ति में भी सराहनीय प्रयास किया है। नंदनी और के.मुरली के युगल नृत्य में आपसी तालमेल, विविध लयात्मक गतियों में चलन, पैरों के काम से लेकर लयकारी में काफी गहराई है। नृत्य में दोनों की प्रखरता देख उन्हें पंडित बिरजू महाराज के कलाश्रम में नृत्य के लिए बुलाया गया। कमानी सभागार में आयोजित समारोह में महाराज के कई प्रतिभावान कलाकारों के बीच इन दोनों ने भी अपना रंग जमाया। नृत्य और अभिनय द्वारा शिव के असीम व्यक्तित्व और उनकी प्रासंगिकता को जीवंतता से दर्शाने का अच्छा प्रयास था। वात्सल्य प्रेम की रचना 'कृष्णानायी बैगनेवारों' में बाल कृष्ण की अठखेलियां, शरारतें और उनके प्रति मां यशोदा के वात्सल्य नृत्य और भावाभिव्यक्ति में दोनों का अंदाज बहुत सरस था। आखिर तीन ताल पर शुद्ध नृत्य के प्रकार उठान, थाट, आमद, तोड़े टुकड़े और कुछ पुरानी बोल-बंदिशों को जिस गहराई से वे पेश कर रहे थे उसे देखकर लगा कि वे जैसे दोनों पूरी तरह इस नृत्य में रच बस गये हों।


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