गीत में कुछ ऐसे भी बेजोड़ कलाकार हैं, जो लोकप्रियता की सीढ़ी नहीं चढ़े। उनमें एक सम्मानित नाम सितार वादक महमूद मिर्जा का है। संगीत के विद्वान और चिंतनशील मिर्जा साहब सितार वादन में मौलिक स्थान रखते हैं। वे रागदारी में जितने सच्चे हैं, उतने ही बजाने में मीठे हैं। सरल स्वभाव के महमूद आज के व्यावसायिक कलाकारों की तरह झूठी मुस्कान नहीं ओढ़े रहते और न सस्ती लोकप्रियता के लिए उत्सुक रहते हैं। तकरीबन पांच दशकों से सितार बजा रहे महमूद भाई का दाखिला भले संगीत के बड़े बाजार में न हुआ हो, पर कला जगत उन्हें उच्चकोटि के वादक के रूप में जानता है। किराना घराने के प्रतिष्ठित गुरु जीवन लाल भट्ट के शिष्य महमूद मिर्जा के वादन में किराना की सरसता तो है ही, उन्होंने अपने चिंतन और कल्पनाशीलता से वादन में एक अलग रंग और आस्वाद भरा है। शायद इसलिए वे संगीत रसिकों के बहुत चहेते हैं। उनके बजाने में तंत्रकारी और गायिकी दोनों का सुन्दर मिशण्रहै। आलाप में राग के रहस्य को परत दर परत खोलने और स्वर विस्तार में उनकी गहरी सोच दिखाई पड़ती है। इधर कुछ वर्षो से इंग्लैंड में संगीत का प्रशिक्षण प्रदान कर रहे महमूद भाई सर्दियों में दिल्ली आते हैं तो संगीत रसिकों के आग्रह पर कार्यक्रम देते हैं। इस बार उनके सितार वादन का कार्यक्रम इंडिया हेबिटेट सेंटर के सभागार में हुआ। हमेशा की तरह अपने सुरीले वादन से उन्होंने श्रोताओं को आनंदित किया। उन्होंने वादन की शुरुआत राग बरवा से की जो इस समय प्रचलन में नहीं है। यह थोड़ा बहुत गायन में तो रहा है पर वादन में बहुत कम सुना गया है। काफी थाट के इस राग को शायद सबसे ज्यादा अहमियत आगरा घराने में दी गई। इसके गायकों ने इसे यदा कदा गाया। इसका थोड़ा अंग राग देसी से मिलता है। शुद्ध प्रकृति के बरवा राग में ध्रुपद- खयाल की बड़ी और छोटी बंदिशों को गाने का चलन रहा है। राग देसी की छाया के बावजूद इस राग का स्वतंत्र चलन और अलग पहचान है। शुद्ध गंधार के स्पर्श और वक्र से कोमल गंधार लगाकर जिस चतुराई से मिर्जा ने राग के स्वरूप को निखारा वह सुनने लायक था। आलाप में सरसता से एक- एक स्वर को स्पष्ट करते हुए वे मनोरम ढंग से स्वर विस्तार कर रहे थे। इस राग में ठुमरी भी गाई जाती है इसलिए संगीत के कुछ लोग इसे बड़ा राग नहीं मानते। लेकिन खयाल अंग में इसे पूर्णता से पेश करने में महमूद भाई ने इसके रंजकतत्व को सुन्दरता से उभारा है। बराबर की लय में जोड़ और तालबद्ध गत की प्रस्तुति में गमक, सूत, तानें, मींड के स्वरों की निकास लयकारी आदि में उनका अपना मोहक और निराला अंदाज था। खमाज थाट का रसपूर्ण राग रागेश्री की मिठास भी उनके सितार में छनकर आई। स्वरों की पकड़ और गुंजन बहुत कर्णप्रिय था। वादन के तकनीकी पक्ष खासकर तानों की निकास में भी वे मधुर संगीत भरते दिखे। स्वर धैवत और मध्यम की मोहक संगति से राग का रूप खिल गया। तीनों सप्तकों में स्वरों के विचरण में उनकी अच्छी दूरदर्शिता थी। कार्यक्रम का समापन उन्होंने राग पीलू की एक सरस बदिंश से किया। अक्सर कलाकार इस राग को एक धुन के रूप में पेश करते हैं पर महमूद मिर्जा ने इस मधुर राग की कपोलें रागदारी में खोलीं। उनके सितार वादन के साथ तबला पर दिल्ली घराने के जाने माने वादक सुभाष निर्वाण ने न सिर्फ बराबर की संगत की, बल्कि अपने वजनदार और थिरकती उंगलियों से खूबसूरत रंग भी भरा। बजाने में उनके दाएं-बाएं का मेल बजाने में थाप, बोल निकास और लयकारी में अच्छा आकर्षण दिखा। कार्यक्रम के दौरान महमूद मिर्जा की तीखी प्रतिक्रिया आजकल के गाने बजाने पर थी। उनका मानना है कि हमारा संगीत इतना पूर्ण और संपन्न है कि उसे गलत ढंग से छेड़ना या बिगाड़ना ठीक नहीं है। वे हिन्दुस्तानी संगीत में नए रागों को बजाने व अन्य प्रयोग के खिलाफ हैं। उनके अनुसार पूरी तरह से विकसित पुराने रागों को ही संभालना मुश्किल है। नए रागों को बजाने का कोई औचित्य ही नहीं है।
Monday, March 7, 2011
पारंपरिक रागों को सहेजने के हिमायती महमूद मिर्जा
गीत में कुछ ऐसे भी बेजोड़ कलाकार हैं, जो लोकप्रियता की सीढ़ी नहीं चढ़े। उनमें एक सम्मानित नाम सितार वादक महमूद मिर्जा का है। संगीत के विद्वान और चिंतनशील मिर्जा साहब सितार वादन में मौलिक स्थान रखते हैं। वे रागदारी में जितने सच्चे हैं, उतने ही बजाने में मीठे हैं। सरल स्वभाव के महमूद आज के व्यावसायिक कलाकारों की तरह झूठी मुस्कान नहीं ओढ़े रहते और न सस्ती लोकप्रियता के लिए उत्सुक रहते हैं। तकरीबन पांच दशकों से सितार बजा रहे महमूद भाई का दाखिला भले संगीत के बड़े बाजार में न हुआ हो, पर कला जगत उन्हें उच्चकोटि के वादक के रूप में जानता है। किराना घराने के प्रतिष्ठित गुरु जीवन लाल भट्ट के शिष्य महमूद मिर्जा के वादन में किराना की सरसता तो है ही, उन्होंने अपने चिंतन और कल्पनाशीलता से वादन में एक अलग रंग और आस्वाद भरा है। शायद इसलिए वे संगीत रसिकों के बहुत चहेते हैं। उनके बजाने में तंत्रकारी और गायिकी दोनों का सुन्दर मिशण्रहै। आलाप में राग के रहस्य को परत दर परत खोलने और स्वर विस्तार में उनकी गहरी सोच दिखाई पड़ती है। इधर कुछ वर्षो से इंग्लैंड में संगीत का प्रशिक्षण प्रदान कर रहे महमूद भाई सर्दियों में दिल्ली आते हैं तो संगीत रसिकों के आग्रह पर कार्यक्रम देते हैं। इस बार उनके सितार वादन का कार्यक्रम इंडिया हेबिटेट सेंटर के सभागार में हुआ। हमेशा की तरह अपने सुरीले वादन से उन्होंने श्रोताओं को आनंदित किया। उन्होंने वादन की शुरुआत राग बरवा से की जो इस समय प्रचलन में नहीं है। यह थोड़ा बहुत गायन में तो रहा है पर वादन में बहुत कम सुना गया है। काफी थाट के इस राग को शायद सबसे ज्यादा अहमियत आगरा घराने में दी गई। इसके गायकों ने इसे यदा कदा गाया। इसका थोड़ा अंग राग देसी से मिलता है। शुद्ध प्रकृति के बरवा राग में ध्रुपद- खयाल की बड़ी और छोटी बंदिशों को गाने का चलन रहा है। राग देसी की छाया के बावजूद इस राग का स्वतंत्र चलन और अलग पहचान है। शुद्ध गंधार के स्पर्श और वक्र से कोमल गंधार लगाकर जिस चतुराई से मिर्जा ने राग के स्वरूप को निखारा वह सुनने लायक था। आलाप में सरसता से एक- एक स्वर को स्पष्ट करते हुए वे मनोरम ढंग से स्वर विस्तार कर रहे थे। इस राग में ठुमरी भी गाई जाती है इसलिए संगीत के कुछ लोग इसे बड़ा राग नहीं मानते। लेकिन खयाल अंग में इसे पूर्णता से पेश करने में महमूद भाई ने इसके रंजकतत्व को सुन्दरता से उभारा है। बराबर की लय में जोड़ और तालबद्ध गत की प्रस्तुति में गमक, सूत, तानें, मींड के स्वरों की निकास लयकारी आदि में उनका अपना मोहक और निराला अंदाज था। खमाज थाट का रसपूर्ण राग रागेश्री की मिठास भी उनके सितार में छनकर आई। स्वरों की पकड़ और गुंजन बहुत कर्णप्रिय था। वादन के तकनीकी पक्ष खासकर तानों की निकास में भी वे मधुर संगीत भरते दिखे। स्वर धैवत और मध्यम की मोहक संगति से राग का रूप खिल गया। तीनों सप्तकों में स्वरों के विचरण में उनकी अच्छी दूरदर्शिता थी। कार्यक्रम का समापन उन्होंने राग पीलू की एक सरस बदिंश से किया। अक्सर कलाकार इस राग को एक धुन के रूप में पेश करते हैं पर महमूद मिर्जा ने इस मधुर राग की कपोलें रागदारी में खोलीं। उनके सितार वादन के साथ तबला पर दिल्ली घराने के जाने माने वादक सुभाष निर्वाण ने न सिर्फ बराबर की संगत की, बल्कि अपने वजनदार और थिरकती उंगलियों से खूबसूरत रंग भी भरा। बजाने में उनके दाएं-बाएं का मेल बजाने में थाप, बोल निकास और लयकारी में अच्छा आकर्षण दिखा। कार्यक्रम के दौरान महमूद मिर्जा की तीखी प्रतिक्रिया आजकल के गाने बजाने पर थी। उनका मानना है कि हमारा संगीत इतना पूर्ण और संपन्न है कि उसे गलत ढंग से छेड़ना या बिगाड़ना ठीक नहीं है। वे हिन्दुस्तानी संगीत में नए रागों को बजाने व अन्य प्रयोग के खिलाफ हैं। उनके अनुसार पूरी तरह से विकसित पुराने रागों को ही संभालना मुश्किल है। नए रागों को बजाने का कोई औचित्य ही नहीं है।
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