Saturday, January 29, 2011

संगीत के सोपान पर पंडित जी

शास्त्रीय संगीत की अविरल धारा में पवित्रता और शुद्धता के पर्याय थे, पंडित भीमसेन जोशी। उनकी अथक साधना लोगों को रसमय बनाती रही। भारतीय शास्त्रीय संगीत की जिस ऊंचाई पर हम मुग्ध होते हैं, उसे ऊंचे सोपान तक पहुंचाने में पंडित जी का कालजयी योगदान है।
मन में एक सन्नाटा सा छाया हुआ है। क्या सचमुच वह अब हमारे बीच में नहीं रहे। वह हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के किराना घराने के आखरी बड़े गायक थे। संगीत की साधना तो चलती रहेगी, पर पंडित जी जैसा तपस्वी मिल पाना सहज नहीं होगा।
उनके साथ मेरी यादें बचपन से ही जुड़ी हैं। वह मेरे पिता स्व. दीनानाथ मंगेशकर जी से मिलने आया करते थे। उन्हें संगीत साधना में डूबते हुए देखना अद्भुत सुख देता था। जब वह बंदिश लगाते, तो सब कुछ ठहर-सा जाता था। उस समय संगीत की गूढ़ता की बहुत समझ होने पर भी हम महसूस कर पाते थे कि घर पर आया यह योगी विरला है। उनको सुनना ही संगीत की समझ विकसित कर लेना था। हमने एक तरह से उनसे संस्कार पा लिए। जब कभी मन विचलित हुआ, तो उनकी गायकी सुनकर खुद को संतुष्ट किया।
पंडित भीमसेन जोशी के पास कौशल भरी तान तो थी ही, पर सबसे ज्यादा प्रभावित करती थी, उनकी गायकी की आक्रामकता। मंच पर जिस तरह वह प्रस्तुत होते थे, वह देखने-सुनने लायक होता था। उनकी आवाज में एक सम्मोहन था। मंच पर भी वह एक साधक की तरह ही होते थे। सांसों के उतार-चढ़ाव पर उनका अद्भुत नियंत्रण था। उनकी आवाज शायद ही कभी क्षण भर के लिए भी डगमगाई हो, चाहे वह भजन गा रहे हों या खयाल। महाराष्ट्र की भूमि इस बात पर गौरव करती है कि वहां संत तुकाराम, संत ज्ञानेश्वर आदि की संत वाणी गूंजी है। पंडित जी जैसे सिद्ध साधक ने उन वाणियों को आत्मसात कर जब सुर लगाए, तो भक्ति का रस घुल गया। एक तरफ नवजीवन पा रहा देश और दूसरी ओर सीखी हुई परंपराओं को दृढ़ता के साथ जोड़कर देखने का पंडितजी का आग्रह शास्त्रीयता में पगे लोगों को लुभा गया। शास्त्रीयता से नाता रखने वाले लोग भी जो भजे हरि को सदा सुनकर भावविभोर हो जाते। हालांकि उनका मराठी उच्चारण बहुत साफ नहीं था, लेकिन यह गौण बात थी। उनके सुनने वालों के लिए उनके भाव का महत्व था। उनकी लयकारी का महत्व था। कृपा सरोवर, कमल मनोहर, जय दुर्गा दुर्गति परिहारिणी, प्रभु कर सब दुख दूर हमारे जैसे भजनों को सुनिए आपको लगेगा पंडित जी ने डूब कर आनंद पाने के लिए गाया। वह अपनी मां से बहुत प्रभावित थे। भजन की यह लौ मां ने ही जगाई थी।
पंडित जी की गायकी का सबसे अच्छा दौर वह था, जब वह साठ वर्ष की उम्र को पार कर रहे थे। आवाज अपनी प्रखरता में थी, स्वर उनके इशारों पर थे। शास्त्रीयता में पगे एक गायक के लिए ऐसा अवसर संपूर्णता को पाने जैसा है। उनके साथ गुरु से शिक्षा पाने वाली गंगूबाई हंगल तो अपने घराने की सीमाओं में रहीं, पर पंडित जी ने अभिनव प्रयोग भी कर दिखाए।
हमारे परिवार के प्रति उनका गहरा स्नेह रहा है। संगीत के अलावा शायद इसमें उनके और दीनानाथ जी के आत्मीय रिश्तों की भी खुशबू थी। पंद्रह वर्ष पहले, जब मुझे संगीत में पंडित की पदवी दी जा रही थी, तो वह उसमें स्वयं आए। जब उन्होंने पालकी से पगड़ी निकालकर मुझे पहनाई, तो मेरे आंसू छलक आए। इतने यशस्वी व्यक्ति की इतनी विनम्रता! मैं कुछ कह सका। एक बार नहीं, बार-बार ऐसे अवसर आते रहे, जब एहसास होता था कि कितना सरल, भोला-भाला व्यक्तित्व है इनका। यही सद्गुण उनकेसंगीत में भी उतरा। शास्त्रीय संगीत के कद्रदान भी अलग तरह के होते हैं। पर जब एक समर्थ आवाज चारों ओर गूंज रही थी मिले सुर मेरा तुम्हारा, तो सुर बने हमारा , तो पूरा देश आह्लादित होकर वही गा रहा था। यह समर्थ आवाज पंडित जी की ही थी।
पंडित जी की गायकी हमारी धरोहर है। उनकी ईश्वरीय आवाज हमारी परंपराओं में रहेगी। दुख यही है कि अब वह कभी स्वर साधते हुए नजर नहीं आएंगे। संगीत की बिरादरी ने उन्हेंस्वर भास्करकहकर उनके प्रति अपनी श्रद्धा जताई। वह सही मायनों में स्वर भास्कर ही हैं। उनकी गायकी दुनिया को संवारने के लिए है।
(प्रस्तुति- वेद विलास उनियाल)


No comments:

Post a Comment