Sunday, January 16, 2011

सात सुर नहीं, सात सीढ़ियां हैं

संगीत साधक पंडित छन्नूलाल मिश्र के लिएयह शरीर बिना स्वर और लय के निष्प्राण समान है

मैं संगीत को अध्यात्म की नजर से देखता हूं, क्योंकि संगीत अध्यात्म का ही रूप है। संगीत के दो रूप हैं, पहला जन-मन रंजन और दूसरा भव-भय भंजन। एक -एक स्वर ईश्वर का स्वरूप है और ये सात स्वर ईश्वर के पास जाने की सात सीढ़ियां हैं। गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में संकेत भी किया है- सप्त प्रबंध, सुभग सोपाना, ज्ञान नयन निरखत मन माना।मैंने अपनी साधना और खोज से यह सिद्ध किया है कि रामचरित मानस केएक -एक क ांड की रचना एक-एक स्वरों पर हुई है अर्थात सात क ांड सात सुर ही हैं। जब मैं स्वर को ईश्वर में ध्यानस्थ कर गाता हूं, तो एक ज्योति दिखाई देती है। उस समय एक अद्भुत शक्ति का संचार होता है। उस समय मैं भूल जाता हूं कि मैं कौन हूं, कहां गा रहा हूं, किसके सामने गा रहा हूं? उस समय मेरे मन में बस र कार रामचंद्र, म कार मातु जानकी और अ कार जीव का ध्यान रहता है। वेद में भी सा रे गा है यानी सा माने सीता, रे माने राम और ग यानि गुणगान। इसका अर्थ है सीता राम का गुणगान करो। मुझे भी उस समय सिर्फ सीता राम ही ध्यान में रहते हैं। मैं समझता हूं सात स्वर मानव सृष्टि का आधार हैं। सा से साकार ब्रह्म, रे से ऋषि -मुनि, ग से गंधर्व, म से महिपाल (इंद्र), प से प्रजा, ध से धर्म और नी से निराकार ब्रह्म होता है। इनका अर्थ है कि जो सारे विश्व को धारण किए है, उसे स्वर केद्वारा धारण करेंगे, तो हम निराकार ब्रह्म में लीन हो जाएंगे और परम शांति प्राप्त कर लेंगे। यही सात सुरों का भाव है। यह मेरी अपनी परिभाषा और सांगीतिक कल्पना है।
मैं जीवन को संगीत का आधार मानता हूं। यदि संगीत प्राण है, तो सांस स्वर और नाड़ी लय है। स्वर और लय हमारे जीवन की गति है, इसलिए यह जीवन केसाथ चलता है। यदि स्वर लय से विहीन हो जाएगा तो श्वास और नाड़ी का तालमेल भी अवरुद्ध हो जाएगा। इस स्थिति में प्राणी निष्प्राण हो जाएगा। इसलिए जीवन में संगीत का बहुत ही ऊंचा स्थान है। बस इसे समझने की जरूरत है।
मुझे सभी राग प्रिय हैं पर भैरवी और यमन बहुत ही अच्छे लगते हैं। शास्त्र में यमन को कल्याण कहते हैं। कल्याण राग शिव का तथा भैरवी पार्वती का स्वरूप है। शिव पार्वती का ध्यान ही हमें संगीत में सबसे अच्छा लगता है, क्योंकि शिव ने ही डमरू से स्वर और लय की उत्पत्ति की है- रचि महेश निज मानस रागा। मैं देखता हूं कि आज राग की इतनी साधना नहीं हो पाती है जितनी पहले होती थी। पहले स्वर साधक निश्छल थे। उनकेमन में कोई छल-कपट नहीं था। पहले एक राग को गाकर सालों सिद्ध करते थे। आजकल तो एक दिन में दो-दो राग सिखाए जा रहे हैं। इससे न राग सिद्ध होता है और न स्वर।
(जैसा कि उन्होंने देवदत्त शर्माको बताया)

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