संगीत भारतीय जीवन पद्धति का अभिन्न अंग रहा है। मानसून आने के चलते सावन से पहले ही इस बार बनारसी घरानों में संगीत के सुर छिड़ चुके हैं। सुरों में सराबोर प्रख्यात संगीतकारों, ठुमरी व कजरी गायकों की माने तो शरीर की हर गति संगीतमय है। यहां तक की चाल व गुस्सा भी संगीत से भरा है। हम तीन ताल या सोलह मात्रा में चलते हैं जबकि 14 मात्रा में गुस्सा करते हैं। यहां ब्रह्मांड की उत्पत्ति ही नाद या स्वर से मानी जाती है। देवता भी शंख, घंटा, वीणा, मृदंग आदि से शोभित हैं। यह भारतीय समाज है। प्रख्यात ठुमरी गायिका सविता देवी की शिष्या सुचित्रा गुप्ता के अनुसार यहां जन्म से मृत्यु तक जीवन के सभी कार्य के साथ संगीत जुड़ा हुआ है। संगीत के सात स्वर हैं। हर स्वर जीवन के किसी न किसी पक्ष को बताता है। पहला स्वर स है। स से सोहर, यह जन्म के समय गाते हैं जबकि नि से निर्गुण जो आत्मा से परमात्मा के मिलन का प्रतीक है। बीच के पांच स्वर पंचतत्व के प्रतीक हैं। शरीर की हर गति भी संगीतमय है। छह मात्रा या दादरा ताल (धा धी न धा तू न) में पलकें झपकती हैं। यह मात्राएं गाएं या बजाएं इसी रिदम में पलकें झपकेंगी। इसीतरह चाल व गुस्सा है। प्रख्यात शास्त्रीय गायक प्रो. रित्विक सान्याल के अनुसार यहां गीत संगीत भक्ति व साधना से जुड़े हैं। यह शास्त्रीय यानि शास्त्रों से निकले हुए हैं। चैत्र में चैती, सावन में कजरी : पद्मभूषण पं. छन्नूलाल मिश्र के अनुसार चैत्र में चैती, सावन में कजरी। हर मौसम में अलग संगीत। चैता में राम जन्म की चर्चा तो चैती में स्त्री, भक्ति व प्रेम का वर्णन। घाटो वियोग, विरह की वेदना सुनाता है। यह वैराग का प्रतीक है। कजरी सावन की मधुरता बताती है।
Wednesday, June 29, 2011
शरीर की हर गति संगीतमय है
संगीत भारतीय जीवन पद्धति का अभिन्न अंग रहा है। मानसून आने के चलते सावन से पहले ही इस बार बनारसी घरानों में संगीत के सुर छिड़ चुके हैं। सुरों में सराबोर प्रख्यात संगीतकारों, ठुमरी व कजरी गायकों की माने तो शरीर की हर गति संगीतमय है। यहां तक की चाल व गुस्सा भी संगीत से भरा है। हम तीन ताल या सोलह मात्रा में चलते हैं जबकि 14 मात्रा में गुस्सा करते हैं। यहां ब्रह्मांड की उत्पत्ति ही नाद या स्वर से मानी जाती है। देवता भी शंख, घंटा, वीणा, मृदंग आदि से शोभित हैं। यह भारतीय समाज है। प्रख्यात ठुमरी गायिका सविता देवी की शिष्या सुचित्रा गुप्ता के अनुसार यहां जन्म से मृत्यु तक जीवन के सभी कार्य के साथ संगीत जुड़ा हुआ है। संगीत के सात स्वर हैं। हर स्वर जीवन के किसी न किसी पक्ष को बताता है। पहला स्वर स है। स से सोहर, यह जन्म के समय गाते हैं जबकि नि से निर्गुण जो आत्मा से परमात्मा के मिलन का प्रतीक है। बीच के पांच स्वर पंचतत्व के प्रतीक हैं। शरीर की हर गति भी संगीतमय है। छह मात्रा या दादरा ताल (धा धी न धा तू न) में पलकें झपकती हैं। यह मात्राएं गाएं या बजाएं इसी रिदम में पलकें झपकेंगी। इसीतरह चाल व गुस्सा है। प्रख्यात शास्त्रीय गायक प्रो. रित्विक सान्याल के अनुसार यहां गीत संगीत भक्ति व साधना से जुड़े हैं। यह शास्त्रीय यानि शास्त्रों से निकले हुए हैं। चैत्र में चैती, सावन में कजरी : पद्मभूषण पं. छन्नूलाल मिश्र के अनुसार चैत्र में चैती, सावन में कजरी। हर मौसम में अलग संगीत। चैता में राम जन्म की चर्चा तो चैती में स्त्री, भक्ति व प्रेम का वर्णन। घाटो वियोग, विरह की वेदना सुनाता है। यह वैराग का प्रतीक है। कजरी सावन की मधुरता बताती है।
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