Sunday, May 1, 2011

बेगम अख्तर की विरासत


नवाबों के दरबारों में गाई जाने वाली गजलों को शास्त्रीयता से जोड़ने में एक नया मोड़ और रंग अख्तरी बाई ने दिया जो बाद में मलिका-ए-गजल बेगम अख्तर के नाम से मशहूर हुई। हिन्दुस्तानी रागों के आधार पर अपनी दिलकश आवाज से गजल को संवारकर उन्होंने इस गायिकी को रसभरा अनूठा अंदाज दिया। संगीत की छोटी महफिलों से लेकर बड़े-बड़े समारोह में अपनी आवाज का जादू बिखेरने वाली बेगम अख्तर तकरीबन पांच दशक तक गजल की दुनिया में छाई रहीं। उनके निधन के बाद आर्केस्ट्रा के तामझाम के साथ हल्की-फुल्की गजल गायन का दौर शुरू हुआ। हारमोनियम-तबला की संगत पर गजल की परंपरा हाशिये पर चली गई और गीतनुमा गजलों का सिलसिला शुरू हो गया। हालांकि इस दौर में गजल के फलक पर पाकिस्तान के मेहदी हसन, गुलाम अली, रूना लैला और हिन्दुस्तानी गायक जगजीत सिंह तेजी से उभरे। उन्होंने गजल के आधार पर लोकगीतों की धुनों को रंगत देने में आस्वादन जरूर दिया और उनकी गायिकी आम लोगों में लोकप्रिय हुई लेकिन शास्त्रीय संगीत रसिकों को लुभाने में बहुत कामयाब नहीं रही। धीरे-धीरे गीतनुमा गजलों में पस्ती आने लगी और यह गायिकी सीडी के एलबमों में सिमट गई। उसका सबसे बड़ा कारण था कि लोग एक ही पैटर्न की गजलें सुनकर ऊबने लगे थे। संगीत के बाजार में गजल की पुरानी गायिकी की मांग भले कम हो पर संगीत रसिकों के बीच बेगम अख्तर का गायन आज भी जीवंत है। पुरबिया और अवधी रवायत में ठुमरी, दादरा और गजल गाने में उनके अनोखे अंदाज का दिया आज भी जल रहा है। शुरू में उन्होंने कई फिल्मों में अपनी आवाज का जादू बिखेरा और फिल्म अदाकारा के रूप में भी मशहूर हुई। श्रेष्ठ और सर्वाधिक लोकप्रिय गायिका के साथ वे प्रतिष्ठित गुरु भी थीं। उनकी अनेकानेक शिष्याओं में विदुषी रीता गांगुली, अंजली बनर्जी, शांति हीरानंद आदि हैं जिन्होंने उनकी गायन परंपरा को न सिर्फ आगे बढ़ाया बल्कि अम्मी यानी गुरु की विलक्षण शैली को आम लोगों में लोकप्रिय भी किया। बेगम अख्तर को अपने जमाने के कई शायर पसंद थे पर गालिब उनके सबसे पसंदीदा शायर थे। गालिब की गजलों-नज्मों को गाने में जो तेवर और तासीर उन्होंने दी, उसे सुन लोग आज भी मदहोश हो जाते हैं। इस समय बेगम अख्तर की गायन शैली से जुड़ी नई आवाज सुमिता दत्ता की है। विदुषी रीता गांगुली की शार्गिदी में उन्होंने पूरब अंग की गायिकी और गजल की विधिवत तालीम ली और कम ही समय में कुशल गायिका के रूप में अपना नाम दर्ज करवा लिया। हाल में उनके गायन का एक कार्यक्रम इंडिया हेबिटेट सेंटर के सभागार में हुआ। बेगम अख्तर की शैली में खास अपनी गुरु के अंदाज में गजल और नज्में पेश कर सुमिता ने श्रोताओं पर गहरा प्रभाव छोड़ा। उन्होंने गाने का आगाज फैज अहमद फैज की गजल 'आये कुछ अब्र कुछ शराब आए' की प्रस्तुति से किया। यह मेहदी हसन द्वारा गाई गई मशहूर गजल है पर सुमिता ने इसे नए अंदाज में पेश किया। फैज की गजल 'शामी फिराक अब न पूछ' और शकील सफाई की रचना अपने हाथों की लकीरों' को थिरकती लय और सुर में बांधकर पेश करने में सुमिता ने अच्छा समां बांधा। बेगम अख्तर के अंदाज में मीर तकी मीर की गजल 'उल्टी हो गई सब तदबीरें' अपने संगीत में रचित फैज की गजल 'यूं सजा चांद' की प्रस्तुति में उनकी अच्छी सूझ नजर आई। मोमिन की रचना 'रोया करेंगे आप भी', 'घंटों बैठे सोचता हूं कौन धड़कन नज्म करूं, मीना कुमारी की गजल 'जब चाहा इकरार किया और जब चाहा इंकार किया' भी दिल को छूने वाली थीं। आखिर में गालिब की 'हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पर दम निकले' और शकील की गजल 'मेरे हम नवस मेरे हम नवां' सुन बेगम अख्तर की गायिकी जीवंत हो गई।